जीवन्मुक्तिविवेकः १

प्रथमं जीवन्मुक्तिप्रकरणम्

मूलम् 
यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत् । 
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थमहेश्वरम् ॥१॥ 
शब्दार्थ
यस्य- जिसका
निःश्वसितम्- श्वासप्रश्वास रूप
वेदाः- वेद हैं
यो- जो (जिसने)
वेदेभ्यः- वेदों से
 अखिलं जगत्- सम्पूर्ण जगत को
निर्ममे- बनाया ।
अहम्- मैं
तम् विद्यातीर्थमहेश्वरम्- उन विद्यातीर्थमहेश्वर भगवान शङ्करको
वन्दे- वन्दन करता हुँ ।

भावार्थ-
मैं सभी विद्याओंके तीर्थरूप उन भगवान शङ्करकी वन्दना करता हुँ जिन्होंने अपने निःश्वासभूत वेदोंसे इस सम्पूर्ण जगतकी रचना की ।

मूलम् 
वक्ष्ये विविदिषान्यासं विद्वत्न्यासं च भेदतः । 
हेतू विदेहमुक्तेश्च जीवन्मुक्तेश्च तौ क्रमात् ॥२॥
शब्दार्थ
वक्ष्ये- कहुँगा
 विविदिषान्यासं- विविदिषा संन्यासको
विद्वन्न्यासं च- विद्वत्संन्यासको भी
भेदतः- अलग अलग
हेतू- कारण
विदेहमुक्तेः- विदेहमुक्तिका
च- एवं
जीवन्मुक्तेश्च- जीवन्मुक्तिका भी
तौ- वे दोनों( विद्वत्संन्यास एवं विविदिषासंन्यास)
क्रमात्- एक एक कर ।

भावार्थ-
विद्वत्संन्यास और विविदिषासंन्यास की अलग अलग व्याख्या करेगें जो विदेहमुक्ति और जीवन्मुक्ति के कारण हैं ।

1 comment :

  1. maybe it should have been as -
    विविदिषासंन्यास और विद्वत्संन्यास की अलग अलग व्याख्या करेगें जो विदेहमुक्ति और जीवन्मुक्ति के कारण हैं ।

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